डर को दूर करने की प्रक्रिया की शुरुआत उसे पहचानने से होती है।
उत्तर: हां, अधिकतर डर मानसिक होते हैं और सही रणनीतियों से नियंत्रित और समाप्त किए जा सकते हैं।
जिससे हमें घबराहट महसूस होना शुरू हो जाती है और हम अपने आपको कमजोर सा महसूस करने लगते हैं. यानी हम उस वक़्त डरने लगते हैं.
डर के भी अनेक रूप हैं किसी को अंधेरे से डर लगता है तो कोई मरने के डर से कांप उठता हैं किसी को बीमार पड़ने का डर है तो बहुत लोग भविष्य में कहीं उनके साथ कोई आपत्ति या दुर्घटना ना हो जाए यह सोचकर मन ही मन डर रहे होते हैं
यदि आप किसी निश्चित समय सीमा या आगामी घटना के बारे में डर महसूस करते हैं, तो इसे अपने कार्य की योजना बनाने और सोच-समझकर तैयार करने के अवसर में बदल दें, फिर भले ये पेपर शुरू करना हो, प्ले के लिए प्रैक्टिस करना हो या फिर एक स्पीच के लिए प्रैक्टिस करना हो।
यहां एक बात समझने लायक है कि डर का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है मगर खतरा, खतरे का होना वास्तविक है। उदाहरण के लिए यदि आप जंगल में फस जाते हैं वहां जंगली जानवर आपको नुकसान पहुंचा सकते हैं यह बिल्कुल सत्य है लेकिन किसी जानवर ने अभी तक आपको नुकसान नहीं पहुंचाया यह भी सच्च हैं इसलिए अपने डर और खतरे में फर्क करना जरूर सीखें
यहाँ हमारे कहने का मतलब ये नहीं है की आप शेर के सामने जाकर खड़े हो जाइए. हम ये कहना चाहते हैं की जिस तरह की परिस्थितयों से आपको डर लगता है, जहाँ जाने से आपको डर लगता है, जो काम करने से आपको डर लगता है, जिसके सामने जाने से आपको डर लगता है,वहां जाना शुरू कीजिये.
डर एक ऐसी चीज है जिसे जितना पाले, पनाह देंगे, हमें उतना ही अपने चुंगल में समेटने लगता हैं। वक्त रहते यदि इस डर का इलाज नहीं किया जाए तो व्यक्ति धीरे-धीरे लेकिन बहुत छोटी छोटी बातों से भी घबरा कर चिंतित परेशान रहने लगता है, जैसे किसी बहुत बड़ी समस्या ने उसे घेर लिया है।
वहीं यदि ये विश्वास रखें, आप उन चीजों या परिणामों में विश्वास नहीं रखते जो आपने देखी न हों या घटित नहीं हुईं हैं, ऐसी स्थिति मन से डर को पूर्णतः निकाल देता हैं।
नहीं ना? फिर किसी से इतना लगाव क्यों की हमें अंदर ही अंदर उसकी सार संभाल का डर लगने लगे? उससे जुदा होने का डर लगने लगे.
“डर मेरा मार्गदर्शक नहीं है – मैं हूँ।”
अधिकतर लोग जीवन में हार के डर से बहुत से काम नहीं कर पाते हैं। सबसे पहले आपको इस बात को समझना होगा कि हर बार होने वाली हार आपको नया एक्सपीरिएंस देकर जाती है। हार की बदौलत आप कुछ नया सीख पाते हैं। जो आगे बढ़ने में आपकी मदद करता है। हार और जीत सिक्के के वो दो पहलू है, जो आपकी लाइफ को बैंलेंस करते more info हैं।अगर आप हर बार जीतेंगे, तो जीत को स्वाद और हार का सबक दोनों से ही वंचित रह जाएंगे।
एक बार मुझे एक मीटिंग में प्रेजेंटेशन देना था, जिसके लिए मैं तैयार नहीं थी। मैं बहुत डरी हुई थी। मेरी हथेलियां पसीने से भीगी हुई थीं और मेरे दिल की धड़कन भी बहुत तेज हो रही थी। मैं ध्यान लगा कर कुछ पढ़ भी नहीं पा रही थी। मुझे पता था कि मैं डरी हुई हूँ, इतने सारे लोगों के सामने बोलने का डर मुझे सता रहा था।
अपने डर को जज न करें। "अच्छे" या "बुरे" के रूप में तय किए बिना, आपके मन में जो भी भावनाएँ आती हैं, उन्हें स्वीकार करें।
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